अंधकार का प्रतीक बुर्का बने इतिहास की बात

श्रीलंका में दिल-दहलाने वाले बम धमाकों के बाद वहां की सरकार ने बुर्का पहनने पर रोक लगा दी. इसके तुरंत बाद अपने केरल राज्य में एक मुस्लिम शिक्षा निकाय ने अपने कॉलेजों और स्कूलों में ड्रेस कोड पर सर्कुलर जारी कर दिया है. सर्कुलर के अनुसार छात्राओं को अपने चेहरे को बुर्के से ढकने की अनुमति नहीं दी जाएगी.

हो सकता है कि कुछ मुसलमान और छदम सेक्यूलर वादी कहे जाने वाले मित्र श्रीलंका में बुर्के पर बैन को गंभीरता से न लें पर हमारे अपने देश की एक मुस्लिम शिक्षण ने संस्था ने सच में एक मील का पत्थर फैसला लिया है. उसने अपने फैसले को लागू करने के संबंध में उच्च न्यायालय के निर्देश का हवाला दिया है. यह एक बेहद क्रांतिकारी फैसला माना जाएगा.

क्षमा चाहता हूं कि मुसलमानों का एक बड़ा समूह अपने को प्रगति विरोधी के रूप में साबित करने पर आमादा रहता है. इन हालातों में केरल की उपर्युक्त संस्था ने उन कठमुल्ला मुसलमानों को चुनौती दी है, जिन्हें विकास और आधुनिकता जैसे शब्दों से परहेज है.

याद रखिए कि केरल और इस्लाम का संबंध पुरातन है. इस्लाम भारत में केरल के रास्ते ही तो घुसा था. कहते हैं, भारत में पहली मस्जिद केरल में ही स्थापित हुई थी चूंकि केरल देश के सर्वाधिक साक्षर और प्रगतिशील राज्यों में से एक है, इसलिए उम्मीद तो यही की जाती है कि वहां अंधकार युग में जीने की चाहत रखने वाली ताकतों पर हल्ला बोला जाता रहेगा. केरल और शेष संसार में रोशन ख्याल से युक्त शक्तियां आगे बढ़ती रहेंगी. अब लिंग, जाति या धर्म के आधार पर किसी के साथ अन्याय नहीं हो सकता है.

गौर कीजिए कि इस्लामिक देश मोरक्को बुर्के के पहनने पर प्रतिबंध लगा चुका है. जाहिर है कि यदि वहां की सरकार ने बुर्के पर रोक लगाई है तो उसकी तरफ से ये कदम बहुत सोच-विचारके बाद ही लिया गया होगा. इस्लाम को बुर्का प्रथा से जोड़ना कतई सही नहीं है. फ्रांस भी बुर्के या हिजाब के पहनने पर रोक लगा चुका है.

राष्ट्रपति निकोला सारकोजी की कंजरवेटिव सरकार ने 11 अप्रैल 2011 को बुर्के पर प्रतिबंध इस उम्मीद में लगाया था ताकि इससे महिलाओं के सम्मान की रक्षा होगी. फ्रांस में मुसलमानों की आबादी का हिस्सा 9 फीसदी है. ये अधिकतर उत्तरी अफ्रीकी मूल के हैं जहां अल्जीरिया, मोरक्को या ट्यूनीशिया में फ्रांसीसी उपनिवेश हुआ करते थे.

फ्रांस में धार्मिक आधार पर कतई भेदभाव नहीं होता, ये बात आप फ्रांस की विश्व विजयी फुटबॉल टीम के खिलाड़ियों के नामों को पढ़कर भी कोई समझ सकता हैं पर वहां पर अंधकार युग के चिन्हों को स्वीकार नहीं किया जाता.

मैं लगभग बीस वर्ष पहले टर्की की राजधानी अंकारा और वहां के सुप्रसिद्ध महानगर इस्ताम्बुल गया था. मुझे लगा कि जैसे यूरोप के किस शहर में घूम रहा हूँ. स्वछन्द विचरण करते लड़के-लड़कियों को झुंडों में विचरण करते देख तो यही लगा था. इंडोनेशिया तो इससे भी एक कदम आगे है. पहनावा तो छोडिये मुसलमानों के नाम तक महाभारत कालीन हैं. योगिजकार्ता में इंडोनेशिया के पूर्व राजा महाराज अर्जुन से मिलकर लगा की भारत के किसी राजवंश से मुलाकात कर रहा हूँ.

महाराज अर्जुन का विशेष आग्रह था कि आप रामलीला अवश्य देखकर जाइये । रामलीला के 95% पात्र मुसलमान युवक-युवती ही होते हैं । इसी तरह मलेशिया, सिंगापुर, ब्रुनोई और थाईलैंड के मुसलमान युवतियां घुलमिल कर रहती हैं और बुर्के का इस्तेमाल नहीं करतीं।

बुर्के पर रोक लगाने की मांग ब्रिटेन और आस्ट्रेलिया में भी नियमित रूप से सुनाई देती है. कुऱआन में बुर्के के पक्ष में कहीं कोई बात नहीं कहीं गई है पर इसके बावजूद अपने को इस्लाम के जानकार और प्रवक्ता कहने वाले बुर्के के पक्ष में बोलते हुए थकते नहीं हैं. एक बार तारिक फ़तेहसाहब मुझे बता रहे थे कि उनके अपने देश पाकिस्तान में पचास और साठ के दशक मेंविश्व विद्यालयों में बुर्के पहनकर पढ़ने वाली लड़कियों की संख्या बेहद कम हुआ करती थी पर ये अब बढ़ती ही चली जा रही है.

तारिक फ़तेह साहब को शायद मालूम ही होगा कि हमारे अपने देश में भी यही होता रहा है. बुर्के का प्रचलन भारत में भी 60 के दशक के बाद की महामारी है. केरल में बुर्के को लेकर जिस तरह का फैसला लिया गया, उसके बाद सोशल मीडिया में एक खास वर्ग बुर्के के हक में बक-बक करने लगा है.

मैंने एक सज्जन की सोशल मीडिया पर टिप्पणी पढ़ी,जिसमें कहा गया था- ‘अरे जालिमों, तुम अपनी मां और बहनों को कुछ भी कपड़े पहना कर घुमाओ, हमको कुछ लेना देना नहीं, लेकिन हमारी मां-बहनों को बुर्के अच्छे लगते हैं. हमारी शरीयत को बदलने की कोशिश मत करना.’

अब ये दुष्प्रचार है कि बुर्का इस्लाम से जुड़ी कोई चीज है. मुसलमानों को समझना होगा कि उन्हें अकारण दलदल में रखने की चेष्टा उन्हीं के कथित रहनुमा करते हैं. उन्हें धार्मिक मसलों में फंसाए रखने की कोशिशें चलती हैं मिथ्या सूचनाओं के आधार पर कुछ सप्ताह पहले नोएडाप्रशासन नेभी यह फैसला लिया कि पार्कों में किसी धार्मिक आयोजन की अनुमति नहीं दी जाएगी. इस क्रम में पार्कों में भगवती जागरण और नमाज अदा करने की इजाजत भी छीन ली गई. तब कहा जाने लगा कि ‘अब भारत में नमाज पढ़ने की भी अनुमति नहीं मिल रही है.’

यह एक झूठा प्रचार था. मैं मानता हूं कि वह दिन तो कभी नहीं आयेगा जब भारत में नमाज पढ़ने पर रोक लगेगी. बहरहाल, यह अच्छी बात है कि देश के मुसलमानों का एक तबका अब कठमुल्लों के चंगुल से निकल रहा है. अब मुसलमानों के प्रतीक बदल रहे हैं. इनकी प्राथमिकताएं भी बदलीं है. अब इनके प्रतीक जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी, जामिया हमदर्द यूनिवर्सिटी, इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर वगैरह हो चुके हैं.

स्पष्ट है कि नई पीढ़ी के मुसलमान आधुनिक शिक्षा के महत्व को समझने लगे हैं. इधर हाल के दौर में अध्यापक और लेखक डा. हिलाल अहमद, लेखिका रक्षांदा जलील, चिंतक फिरोज बख्त अहमद और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के इतिहास विभाग के प्रोफेसर डा. सज्जाद अहमज जैसे नौजवान अपनी कौम और देश के रोल मॉडल के रूप में उभर रहे है. इनकी तरह और बहुत से नौजवान शिक्षा, बिजनेस, खेल, सिनेमा आदि क्षेत्रों में अपने लिए जगह बना रहे हैं.

बुर्के के पक्ष में बोलने वाले याद रखे कि बुर्का पहनकर बैंक लूटे जा रहे हैं. यहां पर बुर्के को किसी मजहब से जोड़कर नहीं देखा जा रहा है. जम्मू-कश्मीर में बुर्का पहने आतंकवादियों ने बैंक लूटे हैं. जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले में आतंकवादियों ने साल 2017 में दिनदहाड़े बैंक लूट लिया. जम्मू और कश्मीर बैंक की एक शाखा में बुर्का पहने तीन- चार आतंकवादी दाखिल हुए और बंदूक के दम पर नकदी लूटकर फरार हो गए. इसी तरह कश्मीर घाटी में बुर्का पहनने वाली लड़कियां पत्थरबाजी में भी व्यस्त रही हैं.यह जानकारी सारे देश को है.

मुझे एक जानकार मुस्लिम इतिहासकार और अनुसंधानकर्ता पटना की खुदाबख्श लाइब्रेरी में मिले. बातचीत के क्रम में उन्होंने बताया की बुर्का इस्लाम या शरीयत में कहीं नहीं है. ये अरब कबीलों की प्रथा है. यह उन दिनों इजाद किया गया जब कबीले रेगिस्तानों में घूमते थे और जो कुछ मिला लुटपाट करते थे. दुर्भाग्य से उस वक्त लुटने के लिए मुख्यतः दो ही चीजें होती थीं. अनाज और जानवर (ऊंट, भेड़ आदि) और सुन्दर लड़कियां. कबीले अपनी महिलाओं को दूसरे कबीले के नजर से बचाने के लिए बुर्के का प्रयोग करते थे. सफ़र में भी बूढी और बदसूरत महिलाओं को झुण्ड के किनारे और खुबसूरत नवयुवतियों को लूट की डर से बीच में रखकर चलने का प्रचलन था. लेकिन, न तो अब कबीले हैं न लूटमार.

लेकिन, बुर्का पहनने केपक्षधर कठमुल्ले सबकुछ जानते हुए भी दलील देते हैं कि इस पर रोक लगाना किसी भी इंसान के मानवाधिकारों से खेलने के समान है. ये राय बेहद पिलपिली और कमजोर है. इसे कतई सही नहीं माना जा सकता है. ये सोच उन्हीं लोगों की हो सकती है, जो प्रतिगामी विचारों के साथ खड़े रहना पसंद करते हैं.

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