Balasaraswati

विजय कुमार राय

बाला सरस्वती जी की तरह न कोई था, न कोई होगा. वे बला की खूबसूरत थीं और दुनिया की तीन सर्वश्रेष्ठ नृत्यांगनाओं में एक थीं.

प्रसिद्ध नृत्यांगना व राज्यसभा सदस्य डॉ. सोनल मानसिंह ने यह बात कही. आगे उन्होंने कहा कि 1962 में पहली बार मैंने उन्हें मुंबई के भारतीय विद्या भवन में नृत्य प्रस्तुत करते हुए देखा था.

इसी क्रम में बालाजी से अपनी मुलाकात की चर्चा करते हुए सोनल मानसिंह ने बताया, ‘उनसे दूसरी भेंट मद्रास में हुई. उस समारोह में मुझे नृत्य प्रस्तुत करना था.

बालाजी कार्यक्रम से पहले मुझसे मिलने ग्रीन रूम में आई. वहां उन्होंने मेरे नृत्य को देखकर आशीर्वाद दिया था.’ दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में संस्कृति संवाद शृंखला के तहत आयोजित कार्यक्रम में वे अपनी बात रख रही थीं.

संस्कृति संवाद शृंखला की यह बारहवां भाग था. इस संदर्भ में संस्थान (आईजीएनसीए) के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि केंद्र देश के उन सांस्कृतिक मनीषियों पर संस्कृति संवाद शृंखला का आयोजन कर रही है.

जिनका भारत की सांस्कृतिक विरासत में महत्वपूर्ण योगदान रहा है. सच बात यह है कि बालासरस्वती जी भारतीय कला व संस्कृति की राजदूत थीं.

टी. बालासरस्वती की स्मृति में यह कार्यक्रम बीते 13-14 मई को आयोजित किया गया था, जिसमें कला जगत के शीर्ष व्यक्तित्व उपस्थित थे. वह कार्यक्रम सत्रवार दो दिनों तक चला.

पहले दिन सत्र का संचालन डॉ सच्चिदानंद जोशी कर रहे थे. पहले दिन बालासरस्वती को केंद्र में एक परिचर्चा का आयोजन किया गया.

उसके बाद बालासरस्वती की शिष्य नंदिनी रमणी व उनके शिष्यों ने ‘पद मंजरी’ के माध्यम से बाला सरस्वती को नृत्यांजलि दी.

कला के पारखी यह मानते हैं कि बालासरस्वती का नृत्य अभिनय कला, साहित्य और जीवन का समन्वय था. आज इस बात पर विचार करने की जरूरत है कि उन्होंने अपने कृतियों से हमें क्या-क्या दिया है.

पूरा लेख पढ़ें 16 जून के अंक में…

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