फिर आया इंदिरा गांधी-राजीव गांधी की शहादत भुनाने का मौसम

राफेल डील विवाद पर दो तरह की बातें साफ तौर पर देखने में आ रही है. पहली, कुछ नेता अपने विरोधियों पर खुलकर गटर छाप और असभ्य भाषा का इस्तेमाल करके निशाना साध रहे हैं.

दूसरी, कांग्रेस के कुछ नेता फिर से चुनाव से ठीक पहले जनता की सहानुभूति बटोरने के लालच से इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की शहादत को भुनाने में लग गए हैं. ये ठीक है कि इन दोनों नेताओं की दुखद हत्याएं हुईं थीं. पर क्या श्रीमती इंदिरा गांधी की पंजाब नीति वाजिब थी? कौन नहीं जानता कि उन्होंने ही शुरुआती दौर में जरनैल सिंह भिंडरावाले को हर तरह से मदद करके खाद-पानी दिया था.

भिंडरावाले का संबंध एक दौर में एक सिख डेरे से था. वह आगे चलकर सिख मिलिटेंसी के प्रतीक बन गया. पहले तो वह सिख धर्म का एक लोकप्रिय प्रचारक मात्र था. किसको नहीं पता कि पंजाब में कांग्रेस के राज में खालिस्तानी ताकतें मजबूत की गई और उनसे इंदिरा जी के बढ़ावा पर ही जमकर खून खराबा करवाया गया ताकि अकाली कमजोर हो जाएं पर इंदिरा जी का दांव उलटा पड़ा और ऐसा कत्लेआम शुरू हुआ जिसमें हजारों मासूम लोग मारे गए.

फिर इंदिरा गांधी की जब आंखें खुलीं तो उन्होंने सिखों के सर्वाधिक आदरणीय तीर्थ स्थल स्वर्ण मंदिर के अकाल तख्त पर ही टैंक चलवा दिए. क्या अपने ही देश के नागरिकों पर टैंक चलवाना कभी भी किसी जिम्मेदार भारत के नागरिक द्वारा सही माना जा सकता है? यदि हम सही दिल से विचार करें तो क्या हम किस तरह से बेहतर हो गए तानाशाह चीन की तुलना में?

याद कीजिए कि 3-4 जून 1989 को चीन में हुए थियानमेन चौक पर हुए नरसंहार को. चीन सरकार ने आन्दोलनरत चीनी छात्रों पर उसदिन दोपहर में दिन- दहाड़े टैंक चढ़वा दिए थे. हमने भी तो यही किया था. देश को आखिरकार यह जानने का हक तो है ही कि स्वर्ण मंदिर में सैन्य कार्रवाई करने की नौबत आखिर आई ही क्यों? बेशक, यदि समय रहते खालिस्तानी तत्वों को कस दिया जाता तब सैन्य कार्रवाई की नौबत ही नहीं आती.

मुझे याद आती है स्वर्गीय लेफ्टिनेंट जेनरल एस.के सिन्हा की वह बात जो एक शाम अचानक ही उनके मुंह से निकल गई थी. वे मुझे अपने छोटे भाई के तरह प्यार करते थे. मेरे पिता और उनके पिता करीबी मित्र थे और, डिवाइन लाइफ सोसाइटी के सत्संगों के सिलसिले में अक्सर मिला करते थे.

मैं जेनरल सिन्हा को पुकारू नाम से “मन्ने भैया” कहा करता था. जब वे असम और जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल के पद से रिटायर होकर नई दिल्ली के वसंत कुंज के अपने फ़्लैट में आकर रहने लगे तब मैं प्रायः मन्ने भैया से मिलने उनके घर पर जाया करता था.

एक दिन वे मेरे नोएडा आवास पर लंच के लिए आए. सर्दी के दिन थे और हम खुली छत पर धूप का आनन्द ले रहे थे. मन्ने भैया जेनरल कम और एक चिन्तक तथा दार्शनिक विचारक ज्यादा थे. मानें उनसे कहा कि आपको अपने अनुभवों को लिखना चाहिए. नई पीढ़ी को प्रेरणा मिलेगी. वे कहने लगे, छोड़ो यह सब. हम सबों के जुबान न खुलें तो ही बेहतर है. जब सिख नरसंहार पर बात होने लगी तब जेनरल सिन्हा के मुंह से निकल पड़ा , “काश ! मैडम गांधी ने मेरी बात को मान लिया होता तो ऐसा नहीं होता.” मैंनें पूछा क्या हुआ?

वे गंभीर हो गए. आंखें बंद करके बोलने लगे. चेहरे पर पीड़ा का भाव छलक उठा. वे बोलते गए और मैं सुनता गया. “ उस रात मैडम गांधी ने घर पर बुलाया. कहा कि भिंडरावाले का उत्पात बढ़ गया है. शांत करना ही होगा. वे गुस्से में थीं. उत्तेजित दिख रही थीं. वे अपनी योजनाएं बताती गई और मैं सुनता गया. कुछ मिनट बाद उन्होनें मेरी तरफ देखकर पूछा कि कुछ सुना आपने या नहीं? मैंनें कहा कि सबकुछ सुन लिया, लेकिन, आप यह बताइए कि आप चाहती क्या है? भिंडरावाले को ज़िन्दा या मुर्दा पकड़ना या सिखों के आस्था के केन्द्र अकाल तख्त को ध्वस्त करना?

मैडम ने कहा, कि मैं जो कह रही हूं वही करिए चौबीस घंटे के अन्दर. मैंनें कहा कि चौबीस घंटे तो नहीं एक सप्ताह दें तो मैं बिना अकाल तख्त को क्षतिग्रस्त किए हुए ही यह कार्य एक सप्ताह में सम्पन्न करवा दूंगा. वह कैसे? मैंनें कहा कि भिंडरावाले के गिरोह के पास खाने पीने का पर्याप्त सामान नहीं है. शौचालय के लिए भी वे बाहर ही के शौचालयों का प्रयोग करते हैं. यदि हम चारों तरफ से अकाल तख़्त को घेरकर बिजली, पानी बंद कर देंगे तो वे किसी भी हालात में एक सप्ताह से ज़्यादा टिक नहीं पाएंगें और बिना ज़्यादा खून खराबा के सभी समर्पण कर देंगें.”

एक मिनट तक तो मैडम मुझे अवाक होकर देखती रहीं. फिर कहा, “आप जा सकते है.” मैं समझ गया कि वे मुझसे सहमत नहीं हैं और करवाएंगी वही जो ठान लिया है.

हुआ भी वही. मेरे सहयोगी जेनरल वैद्य से ऑपरेशन करवाया गया और प्रतिक्रिया में जो कुछ भी हुआ उसमें मैडम गांधी और जेनरल वैद्य दोनों को ही जान गंवानी पड़ी.

स्वर्ण मंदिर में एक्शन से देश सन्न था. एक व्देयक्शति की जिद से भक्त सिख समाज को देश का शत्रु मान लिया गया था. उसके अपने ही देश में, उसके साथ घोर अन्याय हो रहा था. सरेआम बर्बरतापूर्वक कत्लेआम किया जा रहा था. सिख समुदाय की आवाज सुनी नहीं जा रही थी.

पंजाब के और देशभर के लाखों सिख इंदिरा गांधी से नाराज थे क्योंकि उन्होंने ही सैन्य कार्रवाई के आदेश दिए थे. उसके बाद भी इंदिरा जी को खुफिया एजेंसियों ने सलाह दी कि वे अपने घर से सिख सुरक्षा कर्मियों को हटा लें पर उन्होंने अपनी जिद में उन सलाहों को भी नहीं माना. नतीजा सबके सामने है. उनकी नृशंस हत्या को भी देश ने देखा.

देश ने यह भी देखा कि किस तरह से दिल्ली और देश के विभिन्न भागों में हजारों सिखों का कत्लेआम हुआ. अगर सिखों का कत्लेआम गलत था तो फिर सैन्य कार्रवाई भी कैसे ठीक मानी जा सकती है? पर हमारे यहां सैन्य कार्रवाई को सही मानते हुए इंदिरा गांधी की हत्या को शहादत की श्रेणी में रखा जाता है. उसे इस तरह से प्रस्तुत किया जाता है मानो उनकी शहादत भी गांधी जी और भगत सिंह की श्रेणी की शहादत हो.

दरअसल यह इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने की चाल है. इसी कांग्रेस के बड़े नेताओं की देखरेख में हजारों सिख मारे गए थे. अगर बात दिल्ली की करें तो उसके सज्जन कुमार, एचकेएल भगत, धर्मदास शास्त्री, जगदीश टाइटलर सरीखे नेता सिख विरोधी दंगों को राजधानी की सड़कों पर खुल्लमखुल्ला भड़का रहे थे. अब तो सज्जन कुमार को उम्र कैद की सजा भी हो चुकी है. अब कांग्रेसी किस मुंह से ये कह सकेंगे कि उन दंगों में कांग्रेस का कोई हाथ नहीं था.

अब राजीव गांधी की हत्या की भी विवेचना भी कर लीजिए. उन्हीं की लचर विदेश नीति के कारण भारत ने श्रीलंका में भारतीय शांति रक्षा सेना (आईपीकेएफ) को श्रीलंका में भेज दिया. क्या हमें अपने पड़ोसी देश में सेना को भेजना चाहिए था?

श्रीलंका में शांति की बहाली के लिए गई भारतीय सेना ने अपने मिशन में 1,157 जवान भी बेवजह खो दिये. मतलब बिना किसी जरूरत के हमने अपने इतने सारे वीरों को खो दिया. आप कभी राजधानी दिल्ली के पश्चिम विहार की तरफ जाइये. वहां आपको मेजर (डा.) अश्वनी कान्वा मार्ग मिलेगा.

अश्वनी श्रीलंका में भारतीय आईपीकेएफ के साथ 1987 में जाफना गए थे. वे राजधानी के सरोजनी नगर के सरकारी स्कूल और फिर यूनिवर्सिटी कालेज ऑफ मेडिकल साइंसेज के स्टुडेंट रहे थे. हमेशा टॉपर रहे. मेजर कान्वा 3 नवंबर, 1987 को अपने कैंप में घायल भारतीय सैनिकों के इलाज में लगे हुए थे.

उस मनहूस दिन उन्हें पता चला कि भारतीय सेना के कुछ जवानों पर कैंप के बाहर ही हमला हो गया है. वे फौरन वहां पहुंचे. वे जब अपने साथियों को फर्स्ट एड दे रहे थे तब पेड़ पर छिपकर बैठे लिट्टे के आतंकियों ने उन पर गोलियां बरसा दीं. उन्हें तीन गोलियां लगीं. अफसोस कि दूसरों का इलाज करने वाले को फर्स्ट एड देना वाला कोई नहीं था. वे 93वीं फील्ड रेजीमेंट में थे. जाफना जाने से पहले वे लेह में थे.

बेहद हैंडसम मेजर अश्वनी के लिए शादी के लिए लड़की ढूंढी जा रही थी , जब वे शहीद हुए. वे तब मात्र 28 साल के थे. मुझे मेजर ( डॉ.) अश्वनी की कहानी उनके पिता ने सुनाई थी. इस तरह के बाकी तमाम भारतीय सेना के वीर श्रीलंका में राजीव गांधी की खराब विदेश नीति का शिकार हुए.

उस मिशन के बाद भारत और श्रीलंका के तमिल भी राजीव गांधी के दुश्मन हो गए. इसी के चलते राजीव गांधी की 1991 में हत्या भी हुई. हालांकि इंटेलीजेंट रिपोर्ट थी कि राजीव तमिलनाडु न जाए. उनपर आत्मघाती हमला हो सकता है.

इंटेलीजेंस एजेंसियों के अतिरिक्त वरिष्ठ कांग्रेस नेता और तमिलनाडु के तत्कालीन राज्यपाल डॉ. भीष्मनारायण सिंह जी ने स्वयं राजीव को फोनकर आने को मना किया था. लेकिन उनकी जिद उन्हें मौत के करीब ले गई. पृष्ठभूमि सबको पता है. अब आप इन दोनों नेताओं की हत्याओं को शहदत बता रहे हो. यह कहां से सही माना जाए.

बहरहाल, हमने भाषाई संस्कारों के पतन से अपनी बात का श्रीगणेश किया था. कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ‘प्रधानमंत्री कहता है’ और ‘नरेंद्र मोदी करता है’ जैसी बाजारू भाषा बोलने लगे हैं. क्या ये भाषा किसी नेता को बोलनी चाहिए?

राजनीति में वैचारिक मतभेद हो सकते हैं, पर वे मतभेद निजी नहीं होने चाहिए. राफेल डील पर आपको अपनी बात रखने की पूरी छूट मिली हुई है. तो क्या इस क्रम में भाषा की मर्यादा को भूला दिया जाए? क्या भाषाई संस्कार नाम की कोई चीज नहीं होती?

जाहिर है, जब राहुल गांधी जी अपने सारे भाषणों को इतने निचल स्तर पर ले आएं हैं, तब आप कांग्रेस के किसी अन्य नेता से क्या उम्मीद रख सकते हैं. वे प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के अध्यक्ष हैं. . राहुल के सलाहकारों को उन्हें समझाना चाहिए कि प्रधानमंत्री मोदी का मुकाबला करने के लिए उन्हें अपनी शालीन शैली बनानी होगी पर लगता नहीं है कि वे सुधरेंगे क्योंकि वे बोलते वक्त सोचते ही नहीं हैं.

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