तो नामलेवा तक नहीं रहेगा लेफ्ट दलों का

लेफ्ट पार्टियों को लेकर इस चुनावी माहौल के कोलाहाल में किसी तरह की कोई खास हलचल सामने नहीं आ रही है. हां, बिहार में बेगूसराय से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) ने कन्हैया कुमार को टिकट जरूर दे दिया है. फिलहाल लेफ्ट दलों से कोई भी अन्य दल सीटों का तालमेल करने के लिए भी तैयार नहीं है.

चार लेफ्ट पार्टियों को 2004 के लोकसभा चुनावों में 59 सीटों पर विजय हासिल हुई थी. लोकसभा चुनावों में वह शायद वामपंथी पार्टियों का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था पर 2014 के लोकसभा चुनावों में उसे मात्र 11 सीटें ही मिलीं.

एक तरह से कहा जा सकता है कि उन्हें देश के मतदाता ने धूल चटा मिला दिया. उसके बाद से लेफ्ट पार्टियों के सीताराम येचुरी, डी.राजा और वृंदा करात जैसे नेता सिर्फ सेमिनार सर्किट में ही देखे जाते हैं. वहां पर ये अपने विचार व्यक्त करके खुश हो जाते हैं. ये अंतिम बार कब श्रमिक, किसान या गरीब-गुरुबा के हक में लड़ते हुए नजर आए शायद इन्हें खुद भी याद नहीं.

वैचारिक दूरियों के बावजूद यह तो मानना ही होगा न कि विगत वर्षों में हरिकिशन सिंह सुरजीत, इंद्रजीत गुप्त, ज्योति बसु, चतुरानन मिश्र, रामावतार शास्त्री, भोगेन्द्र झा जैसे सम्मानित नेता भी लेफ्ट पार्टियों के साथ ही रहे हैं पर अब तो लेफ्ट पार्टियां बंगाल, केरल और त्रिपुरा से निकलकर सिर्फ जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी के कैंपस तक ही सिमट गई हैं. वहां के छात्र संघ के चुनाव जीतकर इन्हें ऐसा लगने लगता है कि इन्होंने सर्वहारा की देश में क्रांति कर दी या करने ही वाले है.

देश ने इनका पहली बार असली चेहरा देखा 1962 में चीन से जंग के वक्त. क्या आप यकीन करेंगे कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) ने राजधानी के बारा टूटी इलाके में चीन के समर्थन में एक सभा तक आयोजित करने की कोशिश की थी?

यह अलग बात है कि वे भारी विरोध के कारण वे सफल नहीं हो सके थे. इसे कहते हैं अपनों पर सितम और गैरों पर करम. दूसरे शब्दों में इसे देश के साथ गद्दारी या राष्ट्रद्रोह भी कहा जा सकता है.

2019 का चुनाव बंगाल में वामपंथी दलों के सबसे बुरा साबित होने जा रहा है. इस बात की आशंका है कि उन्हें इस बार जीरो पर ही संतोष करना पड़े. कारण यह है कि लेफ्ट की नीतियों के कारण जो आर्थिक अंसतोष पैदा हुआ, उसे बंगाल की जनता ने उन्हें अभी तक माफ नहीं किया है.

लेफ्ट का जनाधार अब बंगाल में भी समाप्त हो चुका है. 2019 का लोकसभा चुनाव बंगाल में पिछले दो चुनावों के मुकाबले इस बार सिर्फ भाजपा और तृणमूल कांग्रेस की बीच में ही होगा. कांग्रेस भी हाशिये पर चली गयी है. लेफ्ट नेता चुनावी नतीजे वाले दिन दिल्ली के किसी खबरिया चैनलों में हार की गहन समीक्षा जरूर करते मिलेंगें. कुतर्क में उनका तो कोई जवाब नहीं.

कभी वाम मोर्चा का गढ़ रहे पश्चिम बंगाल में उसकी दूकानें धड़ाधड़ बंद होती जा रही है. वहां 2011 के विधानसभा चुनाव में उसे 41.0 फीसद मत मिले थे. यह आंकड़ा 2014 के लोकसभा चुनाव में 29.6 फीसद रह गया. अब आया 2016 का विधानसभा चुनाव. अब लेफ्ट पार्टियों को मिले मात्र 26.1 फीसद मत. यानी गिरावट का यह सिलसिला लगातार जारी है. हो सकता है कि 2019 के चुनाव में उनका मत प्रतिशत 20% के निचे ही रह जाये.

कांग्रेस की बंगाल में खुद ही हालत पतली है, पर वो भी माकपा से चुनावी तालमेल करने के मूड में नहीं है. बिहार में महागठबंधन से भाकपा बेगूसराय की एक सीट की भीख मांग रही थी. पर उसे वो भी नसीब नहीं हुई. अब कन्हैया कुमार अपने दम पर भाजपा के दिग्गज नेता और तेज तर्रार फायर ब्रांड हिंदुत्व के प्रतीक गिरिराज सिंह के सामने होंगे.

महाराष्ट्र में लेफ्ट पार्टियों ने किसानों का एक मार्च निकाला था. इसके बावजूद शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा)ने उन्हें कोई घास नहीं डाली. केरल से आ रही खबरें भी लेफ्ट पार्टियों के लिए खतरें की घंटी ही हैं. उस सुदूर दक्षिण भारत के राज्य में भी लेफ्ट दलों को शिकस्त मिलने जा रही है.

दरअसल वामपंथी दलों को खुद अब आत्म मंथन करना होगा कि उन्हें देश का अवाम चुनावों में खारिज क्यों करता जा रहा है. उन्हें यह तो सोचना ही होगा कि वे किस तरह से फिर से भारत की राजनीति में प्रासंगिक हो जाये . फिलहाल तो लगता नहीं कि वो अपनी बार-बार, लगातार पराजय से कोई सबक सीख पा रहे हैं.

अगर बात त्रिपुरा की करें तो वहां भी लेफ्ट का पिछले विधान सभा चुनाव में सूपड़ा साफ हो गया था. उधर इन्होंने पिछले 25 साल से नफरत की आग फैलाई हुई थी जिसके बारे में जितना कहा जाये उतना ही कम है, यहां चीन के नेताओं की तस्वीरें लगाई जाती थी, पुराने रूस के वामपंथी नेताओं की मूर्तियां लगवाई जाती थी, यहाँ तक की नार्थ कोरिया के तानाशाह किम जोंग की भी तस्वीरें लगाई जाती थी.

भारत के वामपंथियों के यही सब नायक भी हैं, इनको भारत में कोई नायक ढूंढें भी नहीं मिलता, इनके नायक भी विदेशी होते है, भारत से ये लोग कितना नफरत करते है ये भी उसका एक सबूत है.वामपंथियों ने त्रिपुरा में वामपंथी नेता स्टालिन की मूर्ति लगवाई थी. उधर वामपंथियों के हारते ही त्रिपुरा के लोगों ने स्टालिन की मूर्ति और वामपंथी सोच को उखाड़ फेंका.

जरा सोचिए कि वामपंथी दलों के गढ़ समझे जाने वाले पश्चिम बंगाल, केरल तथा त्रिपुरा में भी नौजवान कोई रिश्ता नहीं रखना चाहते. एक रिपोर्ट के अनुसार, माकपा के कुल सदस्यों में मात्र 6.5 फीसद ही 25 साल से कम उम्र के हैं. माकपा की विशाखापट्नम में 2015 में हुई नेशनल कांग्रेस में 727 नुमांइदों ने भाग लिया. उनमें सिर्फ दो ही 35 साल से कम उम्र के थे. अब आप समझ लें कि ये किस हद तक हाशिये पर धकेले जा चुके हैं. नौजवानों में इनका नामलेवा तक नहीं बचा है.

उत्तर प्रदेश विधान सभा के पिछले चुनाव के नतीजों ने शीशे की तरह से साफ कर दिया था कि लेफ्ट पार्टियों से मतदाताओं कोई संबंध नहीं चाहते. उन्होंने सौ सीटों पर कम से कम 10 से 15 हजार वोट हासिल करने का लक्ष्य रखा था. इनकी नीतियों और कार्यक्रमों से जनता अपने को जोड़ नहीं पाती है.

उत्तर प्रदेश चुनाव में पहली बार भाकपा, माकपा और भाकपा( माले) ने विधानसभा चुनावों के लिए साझा प्रत्याशी उतारे. उस चुनाव में वामदलों को कुल मिलाकर 1 लाख 38 हजार 763 वोट ही हासिल हुए थे,जो कुल मतों को 0.2 प्रतिशत था. वहीं नोटा के लिए प्रदेश की जनता ने 7 लाख 57 हजार 643 वोट दिए, यह करीब 0.9 फीसदी बैठता है.

अब कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि लेफ्ट पार्टियों को चुनावों में पराजय का कोई असर भी नहीं पड़ता है. ये बेहयाई से हार स्वीकार भी कर लेते हैं. मानो इन्हें जन्नत की हकीकत समझ आ गई हो.

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