Amit shah
Amit Shah: Amit shah
  • भाजपा अध्यक्ष अमित शाह अक्सर बड़े गर्व से इसे कार्यकर्ताओं को बताना नहीं भूलते
  • अपनी मां के प्रभाव में अमित शाह ने इतिहास, जीवनियां और महाकाव्य पढ़े


रामबहादुर राय
इस पुस्तक का सबसे अच्छा शीर्षक हो सकता है- ‘अतुलनीय अमित शाह की भाजपा यात्रा’. अगर इसे आप अतिरंजना समझते हैं तो एक काम सबसे पहले करिए. हाल में ही छपी पुस्तक- ‘अमित शाह और भाजपा की यात्रा’ ध्यान से पढ़िए. इसके तथ्यों के साक्षी बनिए.

इसे पढ़ते हुए आप पाएंगे कि अमित शाह के अनोखेपन को अपने सामने घटित होते देख रहे हैं. यह आप पर निर्भर करता है कि सिर्फ देखेंगे ही या उससे निकले राजनीतिक रसायन में डूबते जाएंगे. जिस भी रूप में भी आप पुस्तक पूरी करेंगे वह एक नया अनुभव होगा. ऐसा हो ही नहीं सकता कि कोई पुस्तक पढ़े और वह अमित शाह के बोध वाक्य को अपने दिमाग में दर्ज न कर ले.

इसे उसके संदर्भ से जानने पर पूरी बात स्पष्ट हो सकेगी. अमित शाह ने एक योजना शुरू की. उसे ‘पंडित दीनदयाल उपाध्याय विस्तारक योजना’ नाम दिया. इसके अंतर्गत 15 दिन, 6 महीने और एक साल के लिए पार्टी को अपना पूरा समय देने वाले कार्यकर्ताओं को बूथ स्तर तक पहुंचने का प्रशिक्षण दिया गया.

इन्हीं कार्यकर्ताओं को भाजपा में विस्तारक का नाम दिया गया. भाजपा अध्यक्ष ने खुद भी एक विस्तारक के नाते पांच राज्यों में 15 दिनों का अपना प्रवास सुनिष्चित किया. उसमें पश्चिम बंगाल भी था. इसकी शुरूआत उन्होंने नक्सलबाड़ी स्थित बूथ संख्या 93 से की.

इसका राज जो जान-समझ सकेगा वह अमित शाह का कायल हो सकता है. इसे कैलाश विजयवर्गीय ने बताया है. उनसे किसी पत्रकार ने आश्चर्यमिश्रित सवाल पूछा कि ‘पष्चिम बंगाल के दुर्गम नक्सलबाड़ी से विस्तारक योजना षुरू करने का विचार अमित शाह के मन में क्यों आया?’ विजयवर्गीय के उत्तर से उस पत्रकार का समधान हुआ या नहीं, कोई नहीं जानता.

लेकिन एक बात तो बहुत साफ हो गई कि अमित शाह किसी चुनौती को स्वीकार कैसे करते हैं. विजयवर्गीय ने तो सिर्फ उस पत्रकार को यही सूचना दी थी कि ‘अमित शाह ने मुझसे पूछा कि सबसे कठिन क्षेत्र कौन सा है? वहीं से शुरू करते हैं.’ सचमुच हर बाधा पार कर वे वहां पहुंचे. वहीं से शुरू किया. तारीख थी-25 अप्रैल, 2017.

यह तारीख खुद बोल रही है. बता रही है कि 2019 के युद्ध में भाजपा को जो पष्चिम बंगाल में 18 मोर्चों पर असंभव विजय मिली है वह अचानक नहीं है. उसमें खून और पसीना बहा है. उसी नक्सलबाड़ी से लोकतंत्र के संग्राम का बिगुल अमित शाह ने बजाया.

जहां 1967 में हिंसक क्रांति के जुनून में कुछ माक्सवादी ने माओ की राह चुनी थी. उसमें उनका मौलिक कुछ भी नहीं था. नकल थी और जनतंत्र को नकारने, खारिज करने और तानाशाही के एक प्रकार को कायम करने के बचपने का सपना था, वहां अमित शाह में मौलिकता है. भारत भूमि की परंपरा का गहरा ज्ञान है.

लोकतंत्र के रथ को चलाते रहने की बाधाओं को वे सबसे पहले पहचानते हैं. तभी तो वे वहां गए जहां कोई नेता जाने से हिचकता है. उन स्थानों में से एक नक्सलबाड़ी है.

इस पुस्तक के लेखक अनिर्बान गांगुली और शिवानंद द्विवेदी ने पाठकों को सही ही यह सूचित किया है कि ‘जब शाह पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी स्थित बूथ संख्या-93 से विस्तारक योजना की शुरूआत कर रहे थे, तब न तो पष्चिम बंगाल में चुनाव होने वाले थे और न ही यह कोई चुनावी कार्यक्रम था.

यह दिन शाह के अतीत को उनके वर्तमान से जोड़ने वाला सुनहरा अवसर था. अमित शाह ने भाजपा में अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत अस्सी के दशक के शुरूआत में अहमदाबाद के एक वार्ड स्थित बूथ संख्या-193 के बूथ के प्रभारी के तौर पर की थी.

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह अक्सर बड़े गर्व से इसे कार्यकर्ताओं को बताना नहीं भूलते. जो नहीं बताते और यह बताने की बात भी नहीं है. समझने और उनके बताने से निकले सूत्र को पकड़ने की बात है कि एक बूथ कार्यकर्ता भी भाजपा का महिमावान अध्यक्ष हो सकता है.

इस पुस्तक में अमित शाह के अतुलनीयता के उदाहरण हर पन्ने पर हैं. उन सबको निशान लगाकर बताना और गिनाना संभव है, पर वह जरूरी नहीं है. जो भी इसे पढ़ेगा वह स्वयं यह काम कर लेगा.

महत्वपूर्ण तो यह है कि इस पुस्तक के तथ्य किसी टीले पर नहीं, सागरमाथा की चोटियों से बोलते हैं. किसी कोने, अतरे से नहीं, गांव या कस्बे से नहीं, किसी मैदान से नहीं, बल्कि हिमालय श्रृंखला की एक चोटी कचंनजंघा से आवाज दे रहे हैं.

अगर डा. रजनी कोठारी जीवित होते या धीरूभाई सेठ स्वस्थ होते तो इस पुस्तक से उन्हें भारत की करवट लेती राजनीति का विज्ञान तुरंत ख्याल में आता. वे नई पुस्तक लिखने का बीड़ा उठाते। मैं नहीं जानता कि दूसरा कौन है जो यह बड़ा काम करेगा.

इसलिए लिखते क्योंकि डा. रजनी कोठारी ने ही पहली बार अपनी पुस्तक ‘भारत में राजनीति-कल और आज’ से दो निश्कर्श सामने रखे. पहला कि कांग्रेस कभी एक राजनीतिक प्रणाली थी जो ध्वस्त हो रही है.

दूसरा कि भारत का पारंपरिक समाज अब लोकतांत्रिक तरीके से बदलने जा रहा है. इस संक्रमण को उनकी पुस्तक ने समझाया। जहां पहुंचाया उसके आगे की यात्रा को धीरूभाई सेठ ने ‘सत्ता और समाज’ में अंजाम दिया.

लोकतंत्र की राजनैतिक यात्रा समय के साथ रूप बदलती है. वह बदलाव जितनी स्पष्टता से अमित शाह की अध्यक्षता में भारतीय जनता पार्टी के माध्यम से देश के जनमानस में इस बार के जनादेष से प्रकट हुआ है.

वह नई प्रणाली का उदय है. इसका सिद्धांत निरूपित हो चुका है. उसे ही डा. रजनी कोठारी या धीरूभाई सेठ सबसे पहले पकड़ते उसका पाठ बनाते. उसे पढ़ा जाता. जिससे एक स्वस्थ राजनैतिक बहस प्रारंभ होती.

यह भी प्रकट होता कि जिस कांग्रेस प्रणाली के ध्वस्त होने से संक्रमण लंबा चल रहा था वह अब उस पड़ाव पर आ गया है जहां पूर्णता को देखा जाना संभव है. पुस्तक का यह अंष चिहिंत करता है कि अमित शाह की अध्यक्षता में ‘भाजपा संभवतः एक मात्र राजनीतिक दल है, जो हर दिन, हर घड़ी और हर पल सक्रिय नजर आया है.

भाजपा की सक्रियता महज चुनावी कसरत की तरह नहीं नजर आई बल्कि संगठन के बहाव में बहने वाली निरंतर धारा की तरह दिखी है. अपनी आंतरिक बुनावट, सांगठनिक विस्तार और बूथ स्तर तक मजबूत भाजपा ने ऐसी अनेक प्रणालियों का विकास किया है, जो चुनावी अखाड़े में उसे अधिक सबल, सक्षम और सक्रिय बनाता है.’

मधुलिमए अगर होते तो अपने यहां आने-जाने वालों को बताते हैं कि देखो अमित शाह ही यह चमत्कार कर सकते हैं. वे पारखी राजनेता थे. जनसंघ और भाजपा का गहरे में उतरकर अध्ययन करते थे.

यह नरेंद्र मोदी युग है. जिसके लक्षण 2014 में प्रकट हुए। उसे नकारने की हर चाल और हर तरह से पांच साल में कैसे, किनके माध्यम से और क्यों चालें चली गई, इसका विवरण भी इतिहास का हिस्सा है. जिस पर इस पुस्तक में प्रसंगवश ही ध्यान दिया गया है.

यह पुस्तक वास्तव में अमित शाह की अध्यक्षता में भाजपा के राष्ट्रीय रूपांतरण की कहानी कहती है. वह भाशा में सुबोध है. वर्णन में सरल है. एक-एक तथ्य को खोजने की परिश्रमशीलता के प्रमाण हर पन्ने पर हैं.

वैसे तो यह पुस्तक पांच साल की भाजपा को प्रस्तुत करती है, लेकिन उसे एक टापू नहीं बनाती. एक विचारसागर में भाजपा इन पांच सालों में एक द्वीप बनकर नहीं उभरा है, बल्कि उसका अतीत है और है आषाप्रद भविश्य क्योंकि चुनावी पंडितों ने जो-जो भविश्यवाणी के रूप में अपनी इच्छारूपी समुद्री तूफान को अवष्यम भावी बताया था वह बिल्कुल गलत निकला.

जो घटित हुआ वह कैसे घटित हुआ, इसकी ही कथा इस पुस्तक में अमित षाह को केंद्र में रखकर बताई गई है. जनसंघ से आज तक की भाजपा की यह एक संदर्भ पुस्तक हो गई है.

लेखकद्वय ने ठीक ही लिखा है कि ‘इतिहास में पहली बार केंद्र में पूर्ण बहुमत वाली सरकार को सहारा देते हुए पार्टी ने किस तरह काम किया और आगे बढ़ी.’ इसे ‘पार्टी के भीतर से कहा’ जाना जरूरी था इसलिए यह पुस्तक है. एक उदाहरण से इसको समझा जा सकता है.

जिसे खोजने और पाने के लिए आपको इस पुस्तक का तेरहवां अध्याय-‘संगठन और सरकार’ जरूर पढ़ना चाहिए. इसी अध्याय में आप पुस्तक की आत्मा का दर्शन कर सकते हैं. उस यक्ष प्रश्न को फिर से समझ सकते हैं जिसने आजादी के बाद आज तक हर सत्तारूढ़ दल से पूछा है और सही जवाब न देने पर उसे मुर्छित होने का कोप भी सहना पड़ा है.

वह प्रश्न सरकार और सत्तारूढ़ दल के संबंधों का है. इस बारे में यह अंश बड़े काम का है- ‘पिछले तीन दशकों का सबसे विशाल चुनावी जनादेश और बहुमत प्राप्त करने के बाद भी अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा ने पिछले चार वर्शों में स्वयं को नया कलेवर देना और नए सिरे से अभिव्यक्त करना बंद नहीं किया है.

इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि न तो वह संतुश्ट होकर बैठी है और न ही सुस्त हुई है. वास्तव में इस दौरान भाजपा की किसी से तुलना करना कठिन है. यह ऐसा दल है, जिसने विशाल बहुमत के साथ सत्ता प्राप्त की है, अपने बल पर सरकार बनाई है और फिर भी वह अपनी राजनीतिक गतिविधियों को और भी व्यापक बनाती रही है.

सच कहा जाए तो भाजपा की सरकार और पार्टी ने 2014 सेे जो संतुलन और अनुशासन दिखाया है, उसे बनाए रखना अन्य दलों के लिए चुनौती है. नरेंद्र मोदी की सरकार और अमित शाह की अगुआई वाली भाजपा के बीच सटीक तालमेल, का अद्भुत साम्य रहा है और कोई विसंगति नहीं दिखी है.

लगभग साढ़े चार साल के इस कालखंड में संगठन और सरकार के बीच कोई मतभेद नहीं दिखा है. आमतौर पर यह होना इतना आसान नहीं होता.’

स्पष्ट है कि यह पुस्तक 2019 के बड़े जनादेश से पहले की है. जिस अंश का यहां हवाला दिया गया है वह 1950 से 2019 के उस वृतांत को अपने में समाए हुए है जो नेहरू, इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में सरकार और पार्टी के संबंधों की बहुत पेंचीदी दुनिया के राजनीतिक रहस्य को संकेतों से बताती है.

वह यह कि जहां सभी विफल रहे वहां नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में अमित शाह ने सरकार को सहारा दिया. पार्टी का देशव्यापी विस्तार किया. 2019 की चुनौती का सफलता और सार्थकता से जो सामना किया वह किसी चमत्कार से कम नहीं है.

यह पुस्तक बुद्धि के बंद दरवाजे खोलने में सहायता करेगी. पाठक को भाजपा के बारे में विवेकयुक्त बनाएंगी जिससे वह समझ सकेगा कि अरे, एक दशक से जिस अमित शाह के बारे में जो कुछ बुरा सुना है वह सच नहीं है.

वह कांग्रेस कल्पित अमित शाह की काली छाया थी. असली, चमकदार, देशभक्त, अध्ययन और अध्यवसाय से युक्त राश्ट्रीयता की जैसी परिभाशा आज चाहिए उसे अपने सुकर्माें से करने वाला अमित शाह इस पुस्तक से निकलता है.

अमित शाह- पांव के निशान

  • . जन्म- 22 अक्टूबर, 1964
  • . परिवार- बड़ौदा की छोटी सी रियासत मनसा के नगर सेठ का
  • . महर्षि अरविंद इनके घर में जिस कुर्सी पर बैठे वह धरोहर जैसी सुर
  • . पारविारिक संस्कार से प्राप्त अनुशासन
  • . अपनी मां के प्रभाव में अमित शाह ने इतिहास, जीवनियां और महाकाव्य पढ़े
  • . खादी पहनने की प्रेरणा मां से ही मिली
  • . तेरह साल के अमित शाह 1977 में सरदार पटेल की बेटी मनिबेन के चुनाव प्रचार की टोली में शामिल
  • . सोलह साल की आयु में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बने
  • . अखिल भारतीय विद्यार्थी परिशद की गुजरात इकाई में संयुक्त महामंत्री रहे
  • . 1984 में अहमदाबाद के नारनपुरा वार्ड में बूथ एजेंट की जिम्मेदारी
  • . पहली बार बूथ संख्या 263 सांघवी के प्रभारी
  • . कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के साहित्य का गहरा अध्ययन
  • . साहिर लुधियानवी और कैफी आजमी की शायरी के प्रसंशक
  • . भारतीय संगीत और गांधी के भजन प्रिय
  • . क्रिकेट और शतरंज के शौकीन
  • . 1990 में गुजरात प्रदेश भाजपा के संगठन महामंत्री नरेंद्र मोदी के सहयोगी. सदस्यों के रिकार्ड तैयार करने में मददगार
  • . 1991 में गांधी नगर लोकसभा क्शेत्र के उम्मीदवार लालकृश्ण आडवाणी के सारथी.
  • . 2019 के चुनाव में गांधी नगर क्शेत्र से ही लोकसभा सदस्य
  • ( पुस्तक से चुनकर)

कैसे सोचते हैं अमित शाह

‘इसे हमको करना है. समझिए मेरी बात को, अभी तक क्यों नहीं है, इसमें नहीं पड़ना, बल्कि आगे इसको करना है. मैं आपको इसकी आवश्यकता समझा रहा हूं. बड़े-बड़े नेताओं ने अपना जीवन पार्टी के लिए खपाया है, और हम उनके महत्व को गंवाए बैठे हैं.

जब मैं यहां ‘गंवाए’ शब्द प्रयोग कर रहा हूं तो इसको ठीक से समझने की जरूरत है. दीनदयाल जी, अटल जी, आडवाणी जी, कुशाभाऊ ठाकरे जी जैसे व्यक्तित्व विश्व की राजनीति में आसानी से नहीं देखने को मिलेंगे. मगर हमने उनके कार्यों को सहेजा है क्या?…नहीं सहेजा है.

जिस प्रकार का परिवर्तन देश में हो रहा है, आने वाले पंद्रह-बीस वर्शों में दुनिया भर के शोधार्थी भारतीय जनता पार्टी के बारे में जानने की रूचि के साथ आयेंगे. इसकी तैयारी अगर हमने आज नहीं किया तो हम उनको भला क्या देंगे?

क्या हम इतना ही बताने के योग्य हैं कि यहां मेज है, ये कमरा है, ये कुर्सी है और यहां भोजन की व्यवस्था है. हमें इस लक्ष्य के साथ डाक्युमेंटेशन करना होगा, मानो हम 2021 में देश की राजनीति का संपूर्ण इतिहास लिखने की तैयारी कर रहे हों’

(डाक्यूमेंटेशन प्रभाग के पदाधिकारियों से अमित शाह की बातचीत का एक अंश)

    

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