आस्था की नगरी- प्रयागराज

सनातन परंपरा में प्रयागराज का आदिकाल से महत्व रहा है. विशिष्ट धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के कारण यह स्थल अध्ययन का भी केंद्र रहा है.

देश-दुनिया के विद्वानों ने इस स्थल को लेकर अपनी विशेष रुचि व्यक्त की है. प्रयागराज के संगम तट पर ही छह वर्षों के अंतराल पर अर्धकुंभ और 12 वर्षों के अंतराल पर कुंभ पर्व का आयोजन होता है.

यहां गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती नदी का संगम होता है. प्रयाग का कण-कण पवित्र माना गया है. प्रयागराज को 88,000 ऋषियों की तपोभूमि होने का गौरव प्राप्त है.

इन ऋषियों में महर्षि दुवार्सा, महर्षि अत्रि, महर्षि भारद्वाज, महर्षि पाराशर जैसे शीर्ष परंपरा वाले महापुरुष शामिल रहे हैं.

इन ऋषियों की साधना ने प्रयाग की भूमि को आध्यात्मिक तौर पर और भी समृद्ध बनाया है. यहां एक अक्षयवट है, जो काल से परे है. इसमें प्रलय को भी सहन करने की शक्ति है.

कहते हैं कि मुगल बादशाह अकबर के आदेश पर जब सलीम (जहांगीर) यहां नियुक्त किया गया तो उसने इस अक्षयवट को काटने का प्रयास किया था, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद वह विफल रहा.

इस घटना के बाद उसने माना कि हिन्दुत्व कभी नहीं मरेगा. यह पेड़ इसका चिन्ह है. श्रद्धालुओं के मन में अक्षयवट के प्रति असीम श्रद्धा है. चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी अक्षयवट की चर्चा की है.

“नसांग ने लिखा है- ह्यइस नगर में एक देव मंदिर था, जिसके सामने दूर तक फैली शाखाओं वाला एक विशाल वृक्ष है, वह वृक्ष अक्षयवट कहलाता है और उसकी पूजा होती है.”

यह वही अक्षयवट है, जिसे योगी सरकार ने ह्यअर्धकुंभ-2019ह्ण में श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया है. स्मरण रहे कि अब से 450 वर्ष पहले अक्षयवट की पूजा करने पर रोक लगा दी गई थी.

प्रयागराज में जगह-जगह छोटे-बड़े मंदिर हैं, जो अपने प्राचीनतम होने का आभास कराते हैं. कोई मंदिर पुराने वृक्ष की ओट में है तो कोई किसी पुरानी दीवार से लगा हुआ.

पूरा का पूरा नगर चारों पहर भक्ति की अविरल धारा में प्रवाहित होता रहता है. अक्षयवट के अतिरिक्त कई ऐसे पवित्र स्थल हैं, जिनके प्रति श्रद्धालुओं में गहरी आस्था है.

पूरा लेख पढ़ें नवोत्थान के अगस्त अंक में..

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