क्रूरता का चरम : एसिड अटैक

सौरव राय

21वीं सदी का जो समाज अपने को आधुनिक और सभ्य कहकर स्वयं पर इतराता है. उसी समाज में घटित हो रहीं एसिड अटैक की घटनाएं समाज की क्रूरता को भी उजागर कर रही हैं.  

किसी भी सभ्य समाज में क्रूरता का कोई स्थान नहीं होता.  जिस एसिड अटैक शब्द से रूह कांप जाती है उस घटना की पीड़िता के कष्ट को शब्दों में बयां करना मुश्किल है. 

एसिड अटैक की एक ऐसी ही वीभत्स घटना 19 अप्रैल को भागलपुर में हुई. 12वीं कक्षा में पढ़ने वाली पीड़ित युवती आखिरकार 38 दिनों तक जिन्दगी और मौत की जंग में हार गयी. 

उसका इलाज पहले भागलपुर फिर बनारस इलाज में हुआ. उसकी कई सर्जरी भी हुई. इस दौरान हालत में सुधार कुछ सुधार भी हुआ. लेकिन अचानक 23 मई को उसकी हालत खराब हो गयी. 

उसे एयर एम्बुलेंस से दिल्ली लाया गया मगर बचाया नहीं जा सका. सोमवार सुबह 11.30 बजे किडनी इन्फेक्शन के कारण दम तोड़ दिया.

एसिड अटैक की यह हृदय विदारक घटना देश की अकेली घटना नहीं है. हर साल न जाने कितनी लड़कियां इस दंश को झेलती हैं. जिसे सोच कर किसी इंसान की रूह कांप जाए. 

जो एसिड किसी लोहे को गला दे वह कैसे कोई इंसानी शरीर झेलता होगा. एम. पटेल की पुस्तक ‘अ डिजायर ऑफ डिसफिगर: एसिड अटैक इन इंडिया’ के अनुसार भारत में एसिड अटैक की पहली घटना 1982 में हुई थी. 

वहीं साऊथ एशिया में यह पहली बार बांग्लादेश में 1967 घटी. इसकी शुरुआत के बाद लगातार हो रही इसकी पुनरावृति समाज में इसके भयावह रूप को और डरावना बना रही है. 

देश में एसिड अटैक की घटनाएं कम होने के बजाए बढ़ रही हैं. इसी साल 13 मई को भोपाल की रहने वाली एक महिला ने जब अपने पति को तलाक का नोटिस भेजा तो उसने अपनी ही पत्नी पर सरेराह एसिड फेंक दिया. जिससे महिला 50 प्रतिशत तक झुलस गई.

पूरा लेख पढ़ें युगवार्ता के 16 जून के अंक में…

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