तेजस्वी की गैरहाजिरी से जारी है कयासों का दौर

पटना, 02 जून. लाख टके का सवाल यही है कि नेता प्रतिपक्ष पटना में होने के बावजूद बिहार विधानमंडल के मॉनसून सत्र से खुद को दूर क्यों रखे हुए हैं? तकरीबन एक महीने की गुमशुदगी के बाद ट्विटर पर उन्होंने यह जानकारी तो दे दी है कि घुटनों में समस्या होने की वजह से वह इलाज करा रहे थे और अब पूरे दमखम के साथ फिर से नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी उठाते हुए सरकार के साथ दो-दो हाथ करने को तैयार हैं.

मंगलवार को विधानमंडल का तीसरा दिन था, लेकिन वह कहीं भी नजर नहीं आए. विधानमंडल में लगातार तीसरे दिन उनके गैरहाजिरी को लेकर कयासों का दौर जारी है. जानकारों का कहना है कि लोकसभा चुनाव में शिकस्त के बाद से तेजस्वी यादव का आत्मविश्वास लड़खड़ा गया है.

महागठबंधन के नेता के तौर पर उन्होंने अपनी ओर से काफी मेहनत की थी. दिन रात पसीने बहाए थे लेकिन उनकी पार्टी को इसका फायदा नहीं मिला. लोकसभा में राजद का खाता तक नहीं खुला.

राजद के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है. चूंकि लालू यादव की गैरमौजूदगी में राजद का नेतृत्व तेजस्वी यादव ही संभाल रहे थे, इसलिए इस जबरदस्त शिकस्त के लिए एक हद तक वह खुद को जिम्मेदार मान रहे हैं. यही वजह है कि वह चाह कर भी हार के असर से उबर नहीं पा रहे हैं.

ट्विटर पर तो वह जनमुद्दों को लेकर आगे भी संघर्ष जारी रखने की बात कर रहे हैं लेकिन सदन के अंदर वास्तविक धरातल पर मजबूती से खड़ा होने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं. सूत्रों की मानें तो लालू परिवार के अंदर पार्टी पर वर्चस्व को लेकर जारी संघर्ष ने भी उनकी मुश्किलों को बढ़ा दिया है.

तेजप्रताप यादव भले ही सार्जनिक तौर पर उन्हें अपना अर्जुन करार देते रहे हों, लेकिन व्यवहारिक सतह पर उन्होंने तेजस्वी यादव के रास्ते में कांटे ही बिछाए हैं.

अभी पार्टी की कमान जिस तरह से बिखरी पड़ा है उससे लिए एक हद तक तेज प्रताप यादव भी जिम्मेदार हैं और आगे भी तेज प्रताप यादव के व्यवहार में किसी तरह के सुधार की कोई गुंजाइश उन्हें नजर नहीं आ रही है.

तेज प्रताप यादव के नकारात्मक रवैये का असर भी उनके दिलों दिमाग पर पड़ रहा है. उन्हें एक साथ कई मोर्चों पर जंग लड़नी पड़ी है.

तकरीबन एक महीने तक गायब रहने की वजह से तेजस्वी यादव के बारे में यहां चर्चाएं हो रही थीं कि वह अपने पिता लालू यादव की रिहाई और अपने परिवार के सदस्यों को केस मुकदमों से बचाने के लिए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के साथ राब्ता बनाने की कोशिश में लगे हुए थे.

जानकारी के मुताबिक इस तरह की चर्चाओं के बाद राजद के अंदर एक धड़ा इस बात को लेकर सक्रिय हो गया था कि तेजस्वी के नेतृत्व में भाजपा की तरफ मुखातिब होने से बेहतर है सीधे भाजपा के साथ संबंध बनाया जाए.

कुछ नेताओं ने तो इसकी कवायद भी शुरू कर दी थी. योग दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर के साथ सामुहिक रूप से योग करते हुए भी नजर आए थे. राजद के अंदर इस बात को लेकर तीखी प्रतिक्रिया भी हुई थी और ऐसे नेताओं को चिन्हित करके उनके खिलाफ कार्रवाई करने की मांग भी उठने लगी थी ताकि राजद में किसी भी तरह के संभावित विद्रोह को रोका जा सके.

यह स्थिति तेजस्वी यादव के नदारद ररने की वजह से पैदा हुई थी. उनकी पार्टी के अपने नेताओं तक को नहीं पता था कि वह कहां गायब है और क्या कर रहे हैं. यदि वाकई में वह घुटनों का इलाज कराने के उद्देश्य से कही गए थे तो इस संबंध में उन्हें कम से कम अपने पार्टी के नेताओं को विश्वास में लेना चाहिए था.

उनकी गैरमौजूदगी पर हो रही कयासों की वजह से पार्टी के नेताओं के विश्वास उन पर से डिगने लगा था. जिस तरह से पटना में होने के बावजूद बिना कुछ वह अभी भी सदन में पैर नहीं रख रहे है उससे भी राजद के विधायक असहज हैं.

सदन के बाहर उनसे जब तेजस्वी यादव की गैरहाजिरी के बारे में पूछा जाता है तो कमोबेश सभी यही कहते हैं तेजस्वी यादव अपनी जिम्मेदारी को अच्छी तरह से समझते हैं, वह जल्द ही सदन में उपस्थित होंगे. लेकिन क्यों उपस्थिति नहीं हो रहे हैं और कब उपस्थित होंगे इस संबंध में कोई कुछ भी कहने को तैयार नहीं है.

लोकसभा में जबरदस्त शिकस्त के बाद तेजस्वी यादव एक अपरिपक्व नेता की तरह व्यवहार कर रहे हैं. यदि वाकई में उनका स्वास्थ्य खराब है जहां से वह इलाज करा रहे थे वहां से विधिवद एक स्वास्थ्य बुलेटिन जारी कर सकते थे.

कम से कम उनको लेकर नकारात्मक चर्चाएं तो नहीं होती. वह खुद को ट्वीट पर लगातार अपडेट करते रहे हैं. अपनी गुमशुदगी के वजह की जानकारी वह ट्वीटर पर भी तो दे सकते थे.

दरअसल लोकसभा में मिली जबरदस्त शिकस्त की वजह से वह चीजों को लेकर सही तरीके से सोचने की स्थिति में नहीं हैं. जब तक वह फार्मेट में आ नहीं जाते तब तक वह सामने नहीं आएंगे. अभी वह खुद से जंग से जंग कर रहे हैं. हिन्दुस्थान समाचार/आलोक

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