जादूई नगर काशी
  • बनारस की यह मेरी पहली यात्रा थी. लोगों से यह सुना था कि बनारस कोई घूमने की जगह नहीं है
  • कई दीप गंगा पर प्रज्वलित हो रहे थे. कई दीप गंगा में तैर रहे थे, जिसकी रोशनी में गंगा की धारा का दिव्य रूप दिखाई दे रहा था

शालू शुक्ला

बनारस के एक के बाद एक घाटों को निहारना अच्छा लग रहा था. उसी दौरान राहुल सांकृत्यायन की एक पंक्ति मेरे मन-मस्तिष्क में उतर आई.

वह यह कि ‘अच्छा तर्क है कि पहले स्त्री के हाथ-पैर बांधकर रख दो, फिर कहो कि इतिहास में तो साहसी यात्रिणियों का कहीं नाम ही नहीं आता.’ खैर, अब बात दूसरी है. समय बहुत आगे निकल चुका है.

बनारस की यह मेरी पहली यात्रा थी. लोगों से यह सुना था कि बनारस कोई घूमने की जगह नहीं है,
बल्कि यह जीने की जगह है, बशर्ते उसकी कला मालूम हो. मैंने बनारसी ठाठ के कई किस्से भी सुने थे, जिससे रू-ब-रू होने का अवसर इस यात्रा में मिली.

पूरी रात और दिन की यात्रा के बाद हमारी गाड़ी एक प्राचीन नगर में प्रवेश कर रही थी और हमारा उत्साह चरम पर था. अस्सी घाट तक पहुंचते-पहुंचते सूरज अस्त हो चुका था. यह भी जानकारी मिली कि गंगा आरती भी हो चुकी थी। लेकिन, लोगों का आना-जाना लगा हुआ है.

गंगा के तट पर मल्लाह अपने नावों को बांध रहे हैं. शायद अब वे सुबह की तैयारी कर रहे हैं. अब भी कई दीप गंगा पर प्रज्वलित हो रहे थे. कई दीप गंगा में तैर रहे थे, जिसकी रोशनी में गंगा की धारा का दिव्य रूप दिखाई दे रहा था.

अस्सी घाट पर हल्की-हल्की हवा चल रही थी और खोमचे वाले की आवाज रह-रहकर हवा में गूंज रही थी. हर उम्र के लोग अपने साथी-संगियों के साथ वहां टहल रहे थे.

मुझे इस बात का अनुमान लगाने में देर नहीं लगी कि अस्सी घाट का यह वातावरण नगर की दिन-चर्या का जरूरी हिस्सा है. स्थानीय लोगों से बातचीत के बाद यह जानकारी मिली कि अस्सी घाट पर देर-रात चहल-पहल रहती है.

यह नगर का एक ऐसा स्थान है, जो बड़े से बड़े दार्शनिकों और विद्वानों को भी अपनी तरफ आकर्षित करता है और प्रेमी जोड़े को भी. यहां न कोई समय की परवाह करता है. न समय किसी का इंतजार करता है.

सभी अपनी गति से बेफिक्र होकर चलते दिखाई देते हैं. लोग अपनी टोली में आते हैं. फिर लौट जाते हैं. एकबारगी देखने में यह लगता है कि सभी अलग-अलग हैं, लेकिन भाव की एक ऐसी धारा यहां निरंतर प्रवाहित होती रहती है, जो सभी को एक दूसरे से जोड़े रखती है.

शायद इसलिए यह शहर करीब-करीब मिक्स फ्रूट जूस जैसा है, जिसमें प्रत्येक फल के रस की अपनी भूमिका है. वे सभी अलग भी हैं, और नहीं भी. यहां हर कोई एक जिम्मेदारी के साथ उठ-बैठ और चल-बोल रहा है.

पूरा लेख पढ़ें नवोत्थान के मई के अंक में…

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