रोका जा सकता था 'सुशील' को तंदूर कांड से!

नई दिल्ली. साल 1995 में पत्नी नैना साहनी की हत्या कर बगिया रेस्टोरेंट के तंदूर में उसके शव को जलाने के जुर्म में उम्रकैद की सजा काट रहा सुशील शर्मा शुक्रवार को जेल से रिहा कर दिया गया. कोर्ट ने बहुचर्चित तंदूर कांड के दोषी सुशील शर्मा को फौरन रिहा करने का आदेश दिया है.
दिल दहला देने वाली ये वारदात दिल्ली के गोल मार्केट स्थित सरकारी फ्लैट नंबर 8/2A की है.  जहां सुशील शर्मा ने अपनी पत्नी नैना साहनी की हत्या कर तंदूर में शव को जला दिया था.  दिल्ली हाईकोर्ट ने 3 जुलाई 1995 को पूरे देश को हिलाकर रख देने वाले नैना साहनी तंदूरकांड के दोषी सुशील शर्मा को बड़ी राहत दी है.
डॉक्टरों और मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसी स्थिति तब पैदा होती है जब समस्या बहुत ज्यादा बढ़ जाती है, और इंसान अपना आपा खो देता है.
सुशील शर्मा ने माना है कि उससे गलती हुई है और वो इतना आवेश में आ गया थी वो खुद पर काबू नहीं रख पाया, अगर कोई होता समझाने वाला तो वो ऐसा अपराध नहीं करता.
इस बारे में एक्सपर्ट्स का कहना है कि सुशील शर्मा का कहना गलत नहीं हैं.

HS.News से बातचीत के दौरान समाजशास्त्री और रिलेशनशिप काउंसलर डॉक्टर नीलम सक्सेना ने कहा कि जब किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व इस तरह अचानक से उग्र हो जाए तो समझ लेना चाहिए कि उसकी मानसिक स्थिति पीक पर और वो कुछ भी कर सकता है.  उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं है कि ऐसा एकदम से होता है. ये धीरे-धीरे होता है और हम इस पर ध्यान नहीं देते हैं.
शुरू से ही पर्सनेल्टी कोई न कोई सिग्नल जरूर देती है, और व्यक्ति का स्वभाव, व्यवहार भी चेंज होता रहता है.  चाहे बच्चा हो या बड़ा, किसी के व्यवहार में अचानक से कोई परिवर्तन आता है तो उस पर ध्यान जरूर देना चाहिए. ऐसा न हो कि वो कोई गंभीर रूप ले ले.
डाक्टर नीलम का कहना है कि ऐसे हालातों में काउंसलिंग बहुत जरूरी है. काउंसलिंग इसलिए जरूरी है क्योंकि हम तीसरे व्यक्ति की सुनकर, बात मानने पर कुछ हद तक राजी हो जाते हैं. या कह लें की मस्तिष्क को ये सुकून हो जाता है कि ऐसा हो सकता है जो सामने वाला कह रहा है. इसलिए हमें किसी के व्यवहार में हो रहे बदलाव को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, खासकर वो बहुत ज्यादा एग्रेसिव हो तो.

%d bloggers like this: